-एडवोकेट दीपाली पाण्डेय

मानव अधिकार वह अधिकार एवं स्वतंत्रताएं हैं जो हमें जन्म लेने के साथ ही मिलते हैं, बिना किसी भेदभाव के। ये अधिकार हमारी गरिमा, समानता एवं स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
मानव अधिकार एवं कानूनी अधिकार हमें सुनने में सामान्य लगते हैं पर यह एक जैसे नहीं है। इनके आधार एवं लागू करने के तरीकों में अंतर है। मानव अधिकार वह अधिकार है जो प्रकृति एवं नैतिकता से प्राप्त होते हैं। कानूनी अधिकार वह अधिकार हैं जो देश के संविधान एवं संसद के कानून से प्राप्त होते हैं।
मानव अधिकार पूरी दुनिया में समान होते हैं। कानूनी अधिकार क्षेत्रीय होते हैं, अलग अलग देशों में अलग अलग होते हैं।
मानव अधिकारों को बदला या छीना नहीं जा सकता है। कानूनी अधिकारों को सरकार कानून में संशोधन कर हटा सकती है, बदल सकती है।
मानव अधिकार इन्सान की गरिमा एवं स्वतंत्रता परर आधारित है। कानूनी अधिकार समाज के नियमों और वैदानिक प्रक्रियाओं पर आधारित है।
भारत में मानव अधिकारों की रक्षा करने के लिए एक मजबूत संवैधानिक संस्था है राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National Human Rights Commission).
मौलिक अधिकार संविधान के भाग 3 में समानता का अधिकार, स्वतंत्रता एवं शोषण के विरुद्ध अधिकार दिये गए हैं।
न्यायपालिका - यदि किसी के अधिकारों का हनन हुआ है तो वह डायरेक्ट हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।
राष्ट्रीय मानव अधिकार के साथ-साथ राज्य स्तर पर भी राज्य मानव अधिकार आयोग स्थापित है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग क्या है?

राष्ट्रीय मानव अधिकार योग एक संवैधानिक संस्था है जिसको मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत बनाया गया है। इसकी स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को हुई है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में हैं।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के मुख्य कार्य

जब किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा मानव अधिकारों का उल्लंघन किया जाता है या लापरवाही बरती जाती है तो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग उसकी जांच करता है।
आयोग किसी भी घटना पर मीडिया में सामने आने पर या अन्य स्रोतों से पता चलने पर भी स्वयं ही संज्ञान लेता है एवं उसे कार्यवाही करने का अधिकार है।
जेल एवं सुधार गृह में जाकर भी मानव अधिकार आयोग निरीक्षण कर कैदियों की स्थिति देखता है।
आयोग लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरुक एवं सजग बनाता है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की संरचना

यह एक बहु-सदस्यीय संस्था है।
अध्यक्ष इसके अध्यक्ष भारत के एक पूर्व न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश होते हैं।
सदस्य - इसमें न्याययिक सेवा से जुड़े हुए या न्याययिक अधिकार से जुड़े हुए लोग होते हैं।
नियुक्तियां इनकी नियुक्तियां भारत के राष्ट्रपति द्वारा विशेष समिति की सिफारिश पर होती है जिसमें प्रधानमंत्री व गृहमंत्री भी होते हैं।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की सीमाएं

इनके पास शिकायतें बहुत होती है परंतु कुछ सीमाएं भी है। इनके पास सजा देने का अधिकार नहीं है, मुआवजा देने का अधिकार नहीं है। ये केवल सिफारिश कर सकता है (हालांकि, सरकार इनकी बात मानती है).
आर्मफोर्स के बारे में इनकी शक्तियां सीमित है। घटना के एक साल पुराने मामलों में यह सुनवाई नहीं करती है।