वृंदा मनजीत

21 जून को विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। समाचार-पत्रों, विद्यालयों, संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर योगाभ्यास के अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए। अगले दिन अधिकांश लोग अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट गए। ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या योग केवल एक दिन मनाए जाने वाला उत्सव है? क्या उसका महत्व वर्ष के शेष 364 दिनों में कम हो जाता है?

वास्तव में योग किसी पर्व, व्रत या विशेष अवसर का नाम नहीं है। योग जीवन को संतुलित, स्वस्थ और सार्थक बनाने की सतत प्रक्रिया है। जिस प्रकार भोजन, निद्रा और स्वच्छता हमारी दैनिक आवश्यकताएं हैं, उसी प्रकार योग को भी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन जाना चाहिए। जिस दिन हम योग न करें, उस दिन कुछ अधूरा-सा महसूस हो, तब समझना चाहिए कि योग हमारे जीवन में सही अर्थों में स्थापित हुआ है।

योग के प्रति एक बड़ी भ्रांति यह भी है कि यह केवल वृद्धावस्था का सहारा है। अक्सर लोग मानते हैं कि जब शरीर में रोग उत्पन्न हो जाएं या बढ़ती आयु के कारण कठिनाइयां आने लगें, तब योग का सहारा लेना चाहिए। जबकि सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। योग रोगों के उपचार से पहले उनके निवारण का माध्यम है। यदि बचपन से ही बच्चों को सरल योगासन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास कराया जाए, तो अनेक शारीरिक और मानसिक समस्याओं को प्रारंभ होने से पहले ही रोका जा सकता है।

आज की पीढ़ी सतत स्क्रीन-टाईम, तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनियमित जीवनशैली से घिरी हुई है। कम आयु में मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। योग बच्चों और युवाओं को केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी सुदृढ़ बनाता है। नियमित योगाभ्यास शरीर में लचीलापन, संतुलन और शक्ति विकसित करता है, वहीं मन में एकाग्रता, धैर्य और सकारात्मकता का संचार करता है। 
जब व्यक्ति स्वस्थ होता है तो उसका परिवार स्वस्थ और प्रसन्न रहता है। स्वस्थ और सकारात्मक व्यक्तियों से ही एक सशक्त समाज का निर्माण होता है। और जब समाज सशक्त होगा तो राष्ट्र भी सक्षम, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनेगा। इसलिए योग का महत्व केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है; यह राष्ट्रीय विकास और मानव कल्याण से भी जुड़ा हुआ है। यह दृष्टिकोण स्वास्थ्य, शिक्षा और राष्ट्र-निर्माण—तीनों को एक सूत्र में जोड़ देता है। योग का इतिहास भी अत्यंत गौरवशाली है। इसकी जड़ें भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम स्रोतों तक पहुंचती हैं। सिंधु-सरस्वती सभ्यता की मुहरों में ध्यानमग्न आकृतियों के संकेत मिलते हैं। वेदों और उपनिषदों में योग के तत्व विद्यमान हैं। बाद में महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के माध्यम से योग को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने योग को "चित्तवृत्ति निरोध" अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों को नियंत्रित करने की प्रक्रिया बताया। कालांतर में हठयोग, राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग जैसी विभिन्न धाराएं विकसित हुईं, जिन्होंने मानव जीवन के विविध आयामों को समृद्ध किया।

आज जब पूरी दुनिया योग को अपना रही है, तब हमारे लिए आवश्यक है कि हम इसे केवल प्रदर्शन या उत्सव का विषय न बनाएं। योग दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वास्थ्य और संतुलन की दिशा में पहला कदम उठाना आवश्यक है, किंतु वास्तविक उपलब्धि तब है जब योग हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाए।

योग दिवस वर्ष में एक बार आता है, परंतु योग का दिन हर दिन है। यही उसकी वास्तविक साधना है और यही उसका सच्चा उत्सव।
आज एक रोचक स्थिति यह है कि भारत का "योग" जब विश्व के अनेक देशों में पहुंचा तो वह "योगा" के नाम से अधिक प्रसिद्ध हो गया। शब्दों का यह परिवर्तन केवल उच्चारण का अंतर नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का भी अंतर है। भारतीय परंपरा में योग का अर्थ है—जोड़ना; अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का सामंजस्य स्थापित करना। महर्षि पतंजलि ने योग को चित्त की वृत्तियों के निरोध की साधना बताया है। इसके विपरीत पश्चिमी देशों में प्रचलित "योगा" प्रायः शारीरिक व्यायाम, फिटनेस, लचीलेपन और तनाव-नियंत्रण तक सीमित होकर रह गया है।

यह कहना उचित नहीं होगा कि योगा सर्वथा गलत है, क्योंकि उसने विश्वभर में करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया है। किंतु भारतीय ‘योग’ का स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक है। आसन योग का केवल एक अंग हैं; इसके साथ प्राणायाम, ध्यान, संयम, आत्मानुशासन और जीवन-मूल्यों का भी गहरा संबंध है। इसलिए जब हम योग की बात करते हैं तो हमें केवल शरीर को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को ध्यान में रखना चाहिए। योगा से स्वास्थ्य मिल सकता है, पर योग जीवन को दिशा भी देता है।

आने वाली श्रृंखला में प्रत्येक योगासन और प्राणायाम के बारे में विस्तार से सचित्र वर्णन प्राप्त होगा।