क़ेशम द्वीप पर ईरान की मिसाइल तैयारी, क्षेत्र में बढ़ी चिंता
दुबई/वाशिंगटन। मिडल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में जारी भारी तनाव एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा संघर्षविराम उस समय पूरी तरह खतरे में पड़ गया, जब अमेरिकी सेना ने ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण क़ेशम द्वीप पर बड़े हमले किए। इस अमेरिकी कार्रवाई से भड़के ईरान ने भी पलटवार करते हुए कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलों और आत्मघाती ड्रोनों की जोरदार बारिश कर दी। हालांकि, दोनों देशों के उच्च अधिकारी और राजनयिक पर्दे के पीछे से कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस सैन्य संघर्ष को शांत करने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन इस ताज़ा दुश्मनी ने शांति वार्ता को पूरी तरह पटरी से उतारने का एक बड़ा जोखिम खड़ा कर दिया है।
दुनिया का सबसे अहम समुद्री चोकपॉइंट: होर्मुज़ का मुहाना
यह पूरा विवाद जिस क़ेशम द्वीप को लेकर बढ़ा है, वह भौगोलिक रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के मुहाने पर स्थित है, जिसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री चोकपॉइंट्स में गिना जाता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन इस जलमार्ग से जुड़ी है, क्योंकि:
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दुनिया के कुल लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) व्यापार का करीब 20% हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
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वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कुल कच्चे तेल (Oil Shipment) के व्यापार का लगभग 25% हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से जाता है।
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अपनी इसी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर ईरान क़ेशम द्वीप पर तैनात अपनी सैन्य ताकतों के जरिए इस पूरे जलमार्ग से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को पूरी तरह नियंत्रित या प्रभावित कर सकता है।
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यह जलमार्ग इराक, कुवैत, बहरीन और कतर जैसे खाड़ी देशों के व्यापार और तेल निर्यात का प्राथमिक समुद्री रास्ता है, साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के ऊर्जा निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी इसी मार्ग पर निर्भर करता है।
ईरान का 'न डूबने वाला विमानवाहक पोत' और मिसाइल सिटी
वैश्विक सैन्य विश्लेषक और रक्षा विशेषज्ञ अक्सर क़ेशम द्वीप को "ईरान का कभी न डूबने वाला विमानवाहक पोत (Aircraft Carrier)" कहकर बुलाते हैं, क्योंकि ईरान ने यहाँ पर बहुत ही विशाल और आधुनिक सैन्य बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) तैयार कर रखा है।
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भूमिगत सुरंगों का जाल: ईरान की मुख्य सेना 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने पूरे द्वीप के नीचे भूमिगत मिसाइल सुविधाओं और मजबूत रक्षात्मक ठिकानों का एक अभेद्य नेटवर्क तैयार किया है, जिसके कारण रक्षा गलियारों में इसे ईरान का 'मिसाइल शहर' भी कहा जाता है।
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घातक मिसाइलों का जखीरा: इन बेहद सुरक्षित भूमिगत सुरंगों में भारी मात्रा में आधुनिक मिसाइलों का भंडारण किया गया है। यहाँ से जहाज-रोधी बैलिस्टिक मिसाइलें (Anti-ship Ballistic Missiles) और क्रूज मिसाइलें पलक झपकते ही दागी जा सकती हैं।
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झुंड-शैली की नौसैनिक रणनीति: द्वीप पर आधुनिक नौसैनिक ठिकाने भी मौजूद हैं, जहाँ रॉकेटों और समुद्री बारूदी सुरंगों (Naval Mines) से लैस बेहद तेज रफ्तार वाली हमलावर नावें (Fast-attack Boats) तैनात रहती हैं। ये नावें खाड़ी में मौजूद अमेरिकी या किसी भी अन्य देश की बड़ी पारंपरिक नौसैनिक सेनाओं को चुनौती देने के लिए 'झुंड-शैली' (Swarm Tactics) से अचानक हमला करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का बड़ा दावा
इस सैन्य कार्रवाई की पुष्टि करते हुए अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने एक आधिकारिक बयान में बताया कि उसने शनिवार और रविवार को ईरान के गेरुक शहर के पास और क़ेशम द्वीप पर सटीक हवाई हमले किए थे। अमेरिकी सेना के मुताबिक, इन हमलों का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय जहाजों और व्यापारिक पोतों के लिए बड़ा खतरा बन चुकीं ईरान की हवाई रक्षा प्रणालियों (Air Defense Systems), एक ड्रोन ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और दो सक्रिय हमलावर ड्रोनों को पूरी तरह तबाह करना था। इस बड़े ऑपरेशन में अमेरिका ने ईरान के एक एक्टिव रडार इंस्टॉलेशन और एक प्रमुख ड्रोन कमांड सेंटर को पूरी तरह से निष्क्रिय (मलबे में तब्दील) कर दिया है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान इसी द्वीप और रडार सिस्टम का इस्तेमाल कर खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर होने वाले मिसाइल हमलों को कोऑर्डिनेट करता था।

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