-    वृंदा मनजीत
आज के समय में बीमारियां अचानक नहीं होतीं। धीरे धीरे हमारी रोजमर्रा की आदतों के साथ हमारे जीवन में प्रवेश करती है। डायाबिटीस, मोटापा, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याएं अब केवर उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रही। इसका सबसे बड़ा कारण है – भोजन को लेकर हमारी लापरवाही।
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है। यह हमारे शरीर की ऊर्जा, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक संतुलन का आधार है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि हम क्या खाते हैं, किस समय खाते हैं और किस तरीके से खाते और पकाते हैं।

भोजन का संयोजन क्यों जरूरी है

अक्सर लोग कहते हैं कि वे अच्छा और पौष्टिक भोजन करते हैं, फिर भी उन्हें पाचन संबंधित समस्याएं रहती है। इसका कारण भोजन का गलत संयोजन हो सकता है। जब हम ऐसी चीजें एक साथ खा लेते हैं जो पचने में अलग अलग समय लेती है, तो पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे गैस, एसिडिटी और शरीर में विषैले तत्व जमा होने लगते हैं।
उदाहरण के लिए, फल बहुत जल्दी पच जाते हैं जबकि दूध या भारी भोजन को पचने में अधिक समय लगता है। यदि दोनों को एक साथ लिआ जाए, तो फल पचने से पहले ही सड़न लगते हैं। इसलिए फल हमेशा अलग समय पर खाना शरीर के लिए अधिक लाभकारी होता है।
कब खाया जाए, यह उतना ही महत्वपूर्ण है
हमारा शरीर एक प्राकृतिक घड़ी के अनुसार कार्य करता है। सुबह जब सूरज उगता है तब से पाचन तंत्र सक्रिय होने लगता है जिसे हम जठराग्नि कहते हैं। जिस समय सूरज की अग्नि चरम पर होती है उसी समय जठराग्नि तीव्र हो जाती है। इसलिए सुबह का नाश्ता सबसे महत्वपूर्ण भोजन माना जाता है। दोपहर में लिया गया संतुलित भोजन शरीर को आवश्यक ऊर्जा देता है, जबकि रात में हल्का और समय पर खाया गया भोजन शरीर को आराम देता है।
देर रात भोजन करने से शरीर को उसे पचाने का पूरा समय नहीं मिल पाता, जिससे मोटापा और अन्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जन्म लेती है।
आपको लग रहा होगा कि मैंने सेहत पर लैक्चर देना शुरु कर दिया। नहीं, मैं उदाहरण के साथ बताती हूं। 
रमेश और सुरेश बचपन के दोस्त है। एक ही स्कूल, एक ही गली, एक ही उम्र। फर्क केवल इतना है कि दोनों की सुबह अलग अलग तरीके से शुरु होती है।
सुबह पांच बजे जब अलार्म बजता है, रमेश बिस्तर से उठ जाता है। खिड़की खोलता है, दो गिलास पानी पीता है और चुपचाप टहलने निकल जाता है।

उधर सुरेश भी उठता है... लेकिन सीधे रसोई की तरफ।

‘पहले चाय मिलेगी क्या?’ और जब तक कड़क चाय हाथ में न हो, सुरेश की आंखें खुलती ही नहीं।

सुबह की पहली आदत

रमेश लौटकर आता है तो भी खाली पेट चाय नहीं पीता। भिगोए हुए बादाम, थोड़े अंकुरित चने, और कभी कभी एक फल। रमेश हंसते हुए कहता है, ‘शरीर को जगाना है, झटका नहीं देना।’
इस बीच सुरेश पकौड़ों की प्लेट देख रहा होता है। तेल टपकता हुआ नाश्ता और दूसरी तरफ कड़क मीठी चाय। सुरेश भी हंसते हुए कहता है, ‘अरे यार, जिंदगी एक ही है।’
दोपहर के बाद कहानी बदलती है। रमेश रोटी, सब्जी, दाल साथ में सलाद और दही खाता है और थोड़ी देर टहलता है। सुरेश भी लंच करता है परंतु उसके हाथ में मोबाइल है, दिमाग कहीं और है, वह जल्दी जल्दी खाना निगल रहा है। तीन बजे तक उसे नींद आने लगती है। गैस, जलन, भारीपन आदि और वह सोचता है,‘आज तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही...’
शाम को रमेश फल या मुंगफली और चने खाता है, और रातको हल्का खाना लगभग सात बजे तक खा लेता है। जबकि सुरेश ऑफिस से आकर टीवी के सामने बैठ जाता है और लगभग 9 या 10 बजे भरपेट खाना खाता है, कहता है, ‘आज तो दिनभर कुछ खाया ही नहीं।’ 

पांच वर्ष बाद...

रमेश पहले की तरह, हंसता, खिलखिलाता, चलता, दौड़ता जिंदगी का आनंद ले रहा है जबकि सुरेश के पास शुगर, बीपी, एसिडिटी की दवाइयों की लिस्ट है। एक दिन दोनों मिलते हैं, सुरेश रमेश से पूछता है, ‘हम दोनों एक उम्र के, साथ पले बढ़े, फिर भी इतना फर्क क्यों?’
रमेश उत्तर देता है, ‘बीमारी तो तुमने पाल रखी थी, उसीके साथ तो तु चाय पीता था, खाना खाता था...’
कहानी का मतलब – रमेश ने शरीर की आवाज़ सुनी जब कि सुरेश ने अपनी जीभ की सुनी, शरीर की उपेक्षा की। समाज में अधिकतर लोग सुरेश जैसे ही है।

कम या ज्यादा नहीं, संतुलित भोजन जरुरी

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में कुछ लोग बार बार खाते रहते हैं, तो कुछ लोग भोजन छोड़ देते हैं। दोनों ही स्थितियां शरीर के लिए नुकसानदायक है। शरीर को नियमित अंतराल पर सीमित मात्रा में पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है।
पेट को ठूंस ठूंस के भरना पाचन को कमज़ोर बनाता है। थोड़ा खाली स्थान छोड़ने से भोजन में सभी पाचक रस मिलते हैं और भोजन अच्छी तरह पचता है और शरीर हल्का महसूस करता है।

भोजन पकाने का तरीका भी मायने रखता है

भोजन जितना शुद्ध और ताजा हो, उतना ही लाभकारी होता है। अत्यधिक तला-भुना और बार बार गरम किया हुआ भोजन धीरे धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। यह भी कहा जाता है कि भोजन केवल सामग्री से नहीं, बल्कि उसे पकाने वाले की भावना से भी प्रभावित होता है। शांत और भक्तिमय मन से बनाया गया

भोजन प्रसाद बन जाता है।
भोजन कैसे खाया जाता है

अक्सर लोग टीवी या मोबाइल देखते हुए खाना खाते हैं। इससे न तो भोजन का स्वाद महसूस होता है और न देखने वाली फिल्म, सीरीयल या रील द्वारा शरीर में उत्पन्न एन्जाइम्स भी विकृति लाते हैं।

अंत में

आज की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या कोई संक्रमण नहीं, बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली है। यदि हम भोजन को केवल आदत नहीं परंतु स्वास्थ्य का आधार समझें तो बीमारियों को टाल सकते हैं और लंबा, स्वस्थ जीवन बीता सकते हैं।
स्वस्थ जीवन की शुरुआत शुद्ध, पौष्टिक, नियमित भोजन और खुशनुमा वातावरण ही है।
अगले लेख में हम नींद, पानी और बच्चों की मोबाइल चलाकर भोजन करना शामिल करेंगे। यदि आपका सवाल हो तो अवश्य पूछें।