भारत के भविष्य को आपदा से बचाने हेतु वन संरक्षण
बी के पी सिन्हा और अरविंद कुमार झा
जब तक जंगल बचाने, पानी की सुरक्षा करने और आपदा प्रबंधन को जोड़ने वाली, प्रकृति पर आधारित रणनीति का उपयोग कर इन पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब तक भारत के पर्यावरण का भविष्य मजबूती के बजाय बढ़ती आपदाओं से भरा बन सकता है। भारत अपने जलवायु के संदर्भ में एक अहम मोड पर खड़ा है, जहां मौसम की खराब घटनाओं में खतरनाक बढ़ौतरी हो रही है और जिससे इंसानी जिंदगी और देश के इकोलॉजिकल संतुलन दोनों को खतरा है। पिछले कुछ वर्षों में चक्रवात, बादल फटने और अचानक आने वाली बाढ की न सिर्फ बार बार आने की दर बढ़ी है, बल्कि उनकी तेजी भी बढ़ी है; जो देश के जलवायु में एक साफ बदलाव दिखाता है। कभी इन्हें बहुत कम संभावना वाले या मौसमी घटनाएं माना जाता था, लेकिन अब ये आपदाएं भारत के सालाना मॉनसून साइकल के लिए लगभग लगातार दिखने वाली पृष्ठभूमि बन गई है, जिससे जलवायु परिवर्तन के बदलते स्वरूप का पता चलता है। मौसम के डेटा से पता चलता है कि उत्तरी हिंद महासागर, जिस में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों शामिल हैं, उसमें पिछली सदी में समुद्र की सतह के तापमान में लगातार 0.8°C से 1.2°C की बढ़ौतरी हुई है, और अरब सागर हाल के दशकों में वैश्विक औसत से लगभग दोगुना गर्म हो रहा है।
हाल ही में, साइक्लोन 'बिपारजोय' 2023 में गुजरात के तट के पास आया, जिससे 100,000 से अधिक लोगों को गुजरात और राजस्थान से दूसरी जगह स्थानांतरित करना पड़ा। उसी वर्ष साइक्लोन 'मोचा' बंगाल की खाड़ी से टकराया, जिससे म्यानमार और बांगलादेश में भारी बाढ़ आई, साइक्लोन 'तेज' ने अरब सागर के तट के कुछ हिस्सों पर असर डाला; साइक्लोन 'हामून' ने बांगलादेश में नुकसान पहुंचायाः साइक्लोन 'मिडहिल' ने ओडिशा और बश्चिम बंगाल पर असर डाला; और साइक्लोन मिचुंग' ने तटीय आंध्रप्रदेश और तामिलनाडु को नुकसान पहुंचाया।
अगले वर्ष, 2024 में और भी खतरनाक घटनाएं हुई। साइक्लोन रेमल' ने पश्चिम बंगाल, मिजोरम, असम और मेघालय में 33 से अधिक जानें लीं, जबकि साइक्लोन 'फॅगल' की वजह से तामिलनाडु और पुड्डुचेरी में 19 मौतें हुई। मॉनसून के मौसम में केरल के वायनाड में भूस्खलन जैसी खतरनाक घटनाएं हुई, जिस में 420 से ज्यादा लोग मारे गए। हिमालयी
इलाके में भी बहुत ज्यादा तबाही हुई, हिमाचल प्रदेश में जून और अगस्त के बीच 51 बादल फटने से अचानक बाढ़ आई. जिससे 31 लोगों की मौत हो गई और 33 लोग लापता हो गए, जब कि असम में आई खतरनाक बाढ़ ने सौ से अधिक लोगों की जान ले ली।
2025 तक, खासकर हिमालयी इलाके में, उत्तर काशी में तेज बादल फटने से और अचानक आई बाढ़ की वजह से उत्तराखंड के धराली, जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ और देहरादून के सहस्त्रधारा जैसे गांवों तबाह हो गए। साइक्लोन 'शक्ति' ने महाराष्ट्र के मराठवाडा इलाके में भारी बारिश की, जिससे बाढ़ आ गई, जो पहले से सतत सूखे की वजह से ज्ञात इलाका रहा है। इससे पता चलता है कि भारत के अलग-अलग तरह के इलाकों में कितनी आपदाएँ फैल रही हैं।
बहुत ज्यादा खराब मौसम की घटनाएं हवा में जल वाष्प के स्थानांतर से जुड़ी हैं, जिन्हें आम तौर पर 'फ्लाइंग रिवर्स' कहा जाता है। जमीनी नदी प्रणाली की तरह ही इलाके के हाइड्रोलॉजी पर इसका भी बड़ा असर पड़ता है। भारत महाद्वीप में दो 'फ्लाइंग रिवर्स बहुत खास हैं; एक अरब सागर से निकलती है और दूसरी बंगाल की खाड़ी से। बादल फटना आम तौर पर तब होता है जब हिमालय के उपर गर्म, नमी वाली मॉनसूनी हवाएं ठंडी हवा के गुबार से टकराती हैं, जिससे तेज तूफानी बादल घीर जाते हैं और गरज के साथ बारिश होती है। ऊपर की ओर आने वाली तेज हवाएं छोटी बूंदों को साथ लेती हैं और बहुत ज्यादा पानी संग्रहित होने देती हैं। जब ये उपर की ओर आने वाली हवाएं अचानक कमजोर पड़ जाती हैं, तो पानी एक साथ गिरता है, जिससे बादल फटते हैं। ऊबड़-खाबड़ इलाकों और संकरी घाटियों वाली खड़ी ढलानों पर तेज बारिश से पानी का बहाव तेज हो जाता है तो जमीन की पानी सोखने की क्षमता कम होने के कारण भयानक बाढ़ में मलबा भी बहता है।
फ्लाइंग रिवर्स की स्थिरता सीधे तौर पर भारत के जमीनी जल विज्ञान प्रणाली की सेहत और पानी की सुरक्षा पर असर डालती है। उनका फैलाव, समय या तेजी में बदलाव, जमीनी नदियों पर एक बड़ा असर डालता है। मॉनसून पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने वाले देश के लिए, इन वायुमंडलीय नमी के बहाव और देश के जंगलों के बीच का तालमेल बहुत जरूरी है, जो दोनों तरफ से एक दूसरे को प्रभावित करता है।
भारतीय जंगलों की सेहत और अनोखी जैव विविधता 'फ्लाइंग रिवर्स' से बनी रहती है। बदले में जंगल वायुमंडलीय नमी के बनने से बारिश के होने पर असर डालती है जो क्षेत्रीय जल चक्र को बनाए रखने में मदद करते हैं। उष्णकटिबंधीय इलाकों में हुए अभ्यास इस बात की पुष्टि
करते हैं कि जंगल बारिश के एक बड़े हिस्से को वाष्पन उत्सर्जन के ज़रिए वापस वायुमंडल में पहुंचा कर बारिश पर काफी असर डालते हैं। बड़े जंगल जल के आने-जाने के स्वरूप को निर्धारित करते हैं, क्योंकि वे सतह का बहाव कम करते हैं और ज़मीन के पानी का पुनर्भरण करते हैं, जिससे इलाके की बहने वाली नदियों की स्थिरता और सतत बहाव में मदद मिलती है।
जंगलों की कटाई और वन जमीन के इस्तेमाल में अनियंत्रित बदलाव इस जरुरी तालमेल के लिए एक बड़ा खतरा है। जंगलों के आच्छादन में बदलाव से नमी वाली हवा का रास्ता और तेजी दोनों बदल सकते हैं। खास तौर पर, जंगलों का कम होना और जंगलों का खेती या शहरी इलाकों में बदलना वाष्पन-उत्सर्जन भी कम करता है, जिससे पुनर्चक्रित होने वाली नमी की मात्रा कम हो जाती है।
बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से, खासकर हिमालय, पश्चिमी घाट, मध्य भारत और पूर्वोत्तर जैसे जरुरी इलाकों में, स्थानीय और इलाके के मौसम की निश्चितता बदलने का भारी खतरा है। इससे मॉनसून की शुरुआत, बारिश के दिनों की संख्या, बारिश के मौसम का समय और बारिश की तेज़ी पर असर पड़ता है, परिणामतः बहने वाली नदियों की और खेती की अर्थव्यवस्था की सेहत पर असर पड़ता है। यह प्रभाव जलवायु परिवर्तन से और बढ़ जाता है, जो वायुमंडलीय आर्द्रता की गतिशीलता को बदल सकता है और खराब मौसम की घटनाओं की पुनरावृत्ति बढ़ाता है।
भारत में भारी बारिश आपदाओं में बदल जाती है। प्रभावित इलाकों में नदियों के बाढ़ का पानी आपातकालीन बांध को तोड़ता हुआ फैल जाता है, जिससे खेती में भारी नुकसान होता है, बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर धराशायी हो जाता है, तथा इंसानों और जानवरों की जान चली जाती है। खास बात यह है कि ये आपदाएं मानवजनित कारणों से और बढ़ जाती है, जिस में योग्य तरीके से योजना किए बिना डेवलमेन्ट के काम करना, अतिक्रमण, जंगलों की कटाई (जिससे कटाव और लैंडस्लाइड तेज होते हैं), और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था में रुकावट शामिल हैं। यद्यपि आपदा प्रबंधन पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन जहां तक मूलभूत तथा इंसानो द्वारा किए गए असली कारणों को दूर करने की प्राथमिकता का सवाल है, पॉलिसी में एक बड़ा गैप बना हुआ है। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि भारत खराब मौसम की घटनाओं के एक गंभीर और वर्षानुवर्ष बढ़ते पैटर्न से जूझ रहा है। पुणे में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान ने बताया है कि पिछले चार दशकों में अरब सागर में
आने वाले चक्रवातों की आवृत्ति में 52 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है। अभ्यास से पता चलता है कि 1950 और 2023 के बीच मॉनसून के दौरान अतिवृष्टि के मामलों में तीन गुना बढ़ौतरी हुई है, और 1985 से 2020 तक भारत में आई दस सबसे खतरनाक बाढ़ों में से सात इन बहती नदियों यानि 'फ्लाइंग रिवर्स' से जुड़ी थीं। आजकल, खराब मौसम के हालात का सटीक अनुमान तीन दिन पहले लगाया जा सकता है, हालांकि, तीव्रता और सही जगह का पता लगाना अभी भी एक चुनौती है। इन अनुमानों को जान और माल बचाने में असरदार तरीके से बदलने के लिए, भारत को सिर्फ त्वरित अनुमान से आगे बढ़कर ऐसे बड़े अलर्जीवॉर्निंग सिस्टम लागू करने होंगे जो भूगोल, जनसांख्यिकी और आधारभूत संरचना जैसी स्थानिक स्थितियों को तेज सूचना संप्रेषण और प्रशासकीय प्रतिक्रिया के साथ जोड़ते हों।
हर शहर और जिले में आपदा से बचने के लिए रियलिस्टिक रिस्क असेसमेन्ट के आधार पर हाइपरलोकल क्लाइमेट एक्शन प्लान बनाना आवश्यक है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जंगल बचाने और और उनके संवर्धन करने की कोशिशें न सिर्फ जैव विविधता की सुरक्षा और कार्बन सोखने के लिए जरूरी है, बल्कि हमारी आसमान में बहती नदियों की सेहत और स्थिरता बनाए रखने और उपमहाद्वीप की पारिस्थितिक और आर्थिक विशेषताओं की भलाई के लिए भी बहुत जरुरी है। जंगलों पर अवैध कब्जा, जंगल की जमीन का गैर-वनीय कामों के लिए इस्तेमाल, और भारतीय वन सर्वेक्षण संस्थान की स्टेट ओफ फोरेस्ट रिपोर्ट में जंगल के इलाकों में गुणात्मक बदलावों से संबंधित खतरनाक संकेतों को गंभीरता से लेने, और जंगल के इकोसिस्टम और वाटरशेड को ठीक करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। फ्लाइंग रिवर्स और वनों के अटूट रिश्ते को पहचानना जरूरी है, क्योंकि इससे देश में पानी की सुरक्षा और सीमा पार कारणों से जुड़ी आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति-आधारित रणनीति के साथ साथ एक मजबूत फॉरेस्ट्री सेक्टर और एक मजबूत नेशनल डिजास्टर मैनेजमेन्ट ऑथोरेटी की जरुरत स्पष्ट हो जाती है। मंत्रालयों, संशोधन केंद्रों, केंद्र और राज्य सरकारों और पड़ोसी देशों के बीच बेहतर तालमेल भी होना आवश्यक है जिससे मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्तीय प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक विशेषज्ञता को सहारा प्राप्त हो सके। इस समझ को नीति और व्यवहार में शामिल करके भारत जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों के लिए बेहतर तैयारी कर सकता है और अपने पारिस्थितिक तथा आर्थिक विकास को सुनिश्चित कर सकता है।

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