भारत कीआधारभूत संरचनाऔर अर्थव्यवस्था को कमजोर करता…अत्यधिक जलवायु परिवर्तन
-बी के पी सिन्हा औरअरविंद कुमार झा
गर्मी में पिघलती सड़कों से लेकर पानी की कमी से बंद होने वाले पावर प्लांट और मौसमकी मार से लड़खड़ाते टेलीकॉम नेटवर्क तक,भारत के हाईवे, रेलवे, एनर्जी ग्रिड, पोर्ट और डिफेंस पोस्ट ‘क्लाइमेट शॉक’ के कारणतेज़ी से कमज़ोर होते जा रहे हैं।
‘क्लाइमेट चेंज’ सिर्फ़ अनियमित बारिश, हीटवेव और बदलतेमौसम की घटनाओं से होने वाली प्राकृतिक आपदाओं के बारे में नहीं है; यह चुपके किंतुसक्रिय रूप से हमारे देश की रीढ़ की हड्डी को कमज़ोर कर रहा है, इसकी आधारभूत संरचनाऔर नतीजतन अर्थव्यवस्था पर बहुत ही सूक्ष्म तरीके से असर डाल रहा है। भारत के ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर – हाईवे और रेलवे से लेकर पावर ग्रिड, पोर्ट, एयरपोर्ट, पानी के सिस्टम और टेलीकॉम नेटवर्क तक – बढ़ते संकट का सामना कर रहे हैं, जैसे किसी ‘साइंस फिक्शन’ में, रेलवे ट्रैक, जो मूल रूप से एक सीमित तापमान रेंज में चलने के लिए डिज़ाइन किए गए थे, बहुत ज़्यादा गर्मी में साँपों की तरह मुड़ते हुए बताए जाते हैं, और नई बनी सड़कें पैरों के नीचे पिघल जाती हैं। 2023 में, बहुत ज़्यादा हीटवेव ने झारखंड के दिलवा स्टेशन जैसी जगहों पर रेलवे ट्रैक को टेढ़ा और मुड़ते हुए देखागया। कई राज्यों में ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं, जिसके कारण दुर्घटनाओं को रोकने के लिए विशेषनिगरानी दलोंको तैनात किया गया, गर्मियों में सख़्त सुरक्षा प्रोटोकॉल और कमज़ोर हिस्सों मेंगतिपर रोक भी लगाई गई। हमारी सड़कें भी इससे प्रभावित हो रही हैं। अप्रैल 2023 में, सूरत में चंद्रशेखर आज़ाद ब्रिज को अडाजन पाटिया से जोड़ने वाली सड़क का एक बिल्कुल नया 200 मीटर का हिस्सा, चिलचिलाती गर्मी में सचमुच पिघलने लगा। इस घटना ने साफ़ तौर पर दिखाया कि अगर भारतीय सड़कें जलवायु प्रतिरोधी सामग्री (क्लाइमेट-रेज़िलिएंट मटीरियल) से नहीं बनी हैं और पुरानी तापमान सीमाको ध्यान में नहीं रखने सेवे कितनी कमज़ोर हो जाती हैं।
ज़्यादा बारिश से अलग तरह की दिक्कतें होती हैं। खराब मौसम की वजह से बनी छोटी-छोटी दरारों में बारिश का पानी रिसकर गड्ढे बना देता है और,अधिकतरमामलों में, सड़क के बड़े हिस्से टूट जाते हैं। यह देखते हुए कि भारत में 60प्रतिशत से ज़्यादा सामान-ढुलाई और 85प्रतिशत लोग सड़क परिवहन पर निर्भर हैं, मौसम की वजह से होने वाला ऐसा नुकसान एक बहुत बड़ा खतरा है। यह हमारी सुरक्षा, स्वास्थ्य देखरेख प्रणाली (हेल्थकेयर सिस्टम)तक पहुंचकरज़रूरी सामानों के लिए आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की क्षमता और आखिर में देश के आर्थिक विकास पर असर डालता है। विद्युत आपूर्तिपर भी इसका असर पड़ता है। हाइड्रोपावर, जो देश की ऊर्जाका लगभग 13प्रतिशत है, आजखतरे में है। नदियों के लगातार बहाव पर इसकी निर्भरता इसे अनियमित मानसून, भूस्खलन, और पिघलते ग्लेशियरों के कारणप्रभावित करती है, औरये सबबिजली उत्पादन में रुकावट डाल सकते हैं। इसी तरह, थर्मल पावर प्लांट, जो भारत कोलगभग 83 प्रतिशत बिजली देते हैं, उन्हें ठंडा करने के लिए बहुत ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है। जल उपलब्धता कीअनियमितताउत्पादन क्षमता कोबहुत ज़्यादा कमज़ोर बनाती है, उत्पादन क्षमता पर असर डालती है और ज़रूरी इलाकों में बिजली की कमी पैदा कर देतीहै। महाराष्ट्र में परली थर्मल पावर स्टेशन, जो मराठवाड़ा इलाके के लिए बहुत ज़रूरी है, उसे खतरनाक रूप से कम होतेजलाशय स्तरके कारण बार-बार बंद होना पड़ा है। मार्च 2016 में, कर्नाटक में 1,720 MW के रायचूर थर्मल पावर स्टेशन को भी पानी की भारी कमी के कारण कई यूनिट बंद करने पड़े थे।
2013 और 2016 के बीच, भारत की 20 सबसे बड़ी थर्मल यूटिलिटी कंपनियों में से 14 को पानी की कमी के कारण अलग-अलग जगहों पर काम रोकना पड़ा, जिससे लगभग ₹9,100 करोड़ का नुकसान हुआ। तेज़ गर्मी की लहरों के साथ, बिजली की मांग बढ़ जाती है, जिससे पावर ग्रिड अपनी अंतिमसीमापर पहुँच जाते हैं। 2024 की गर्मियों में दिल्ली की बिजली की मांग 8,300 मेगावाट को पार कर गई — जो ‘नेशनल कैपिटल टेरिटरी’ में अब तक का सबसे ज़्यादा रिकॉर्ड है — इससेशहर के इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ा। गर्म मौसम और दबाव वाला इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बिजली की मांग में तेज़ी से बढ़ोतरी का कारण बनता है। टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम पर भीदबाव रहताहै क्योंकि मोबाइल टावर, डेटा सेंटर और इंटरनेट केबल को भी बाढ़, तेज़ हवाओं और अत्यधिकगर्मी का खतरा है। डेटा सेंटर, जिन्हें ठंडे माहौल की ज़रूरत होती है, उनमें ‘हीट वेव’ के दौरान लगातार ओवरहीटिंग का खतरा रहता है, जिससे सेवाजारी रहने में दिक्कत होतीहै।नागरिक व्यवस्थाके अलावा, डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर भी तेज़ी से खराब होतेमौसम से प्रभावित होते जा रहे हैं। तटों पर, चक्रवाती तूफान और तटीय बाढ़नौसेना की सुविधाओं पर असर डालते हैं। उदाहरण के लिए, 2014 में ‘हुदहुद’ तूफान ने पूर्वी तट पर मूलभूतसुविधाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया। हिमालय में, सियाचिन और लद्दाख के कुछ हिस्सों जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में भारतीय सेना की चौकियों पर ग्लेशियर के पीछे हटने और मौसम के अचानक बदलने का बड़ाअसर पड़ता है। पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रुप से जमी हुई ज़मीन) पिघलने से नींव कमजोर हो जाती है, जबकि अचानक हिमस्खलन तथाअचानक बाढ़ से सैनिकों और उनके लिए आवश्यकआपूर्तिके लिए खतरा बढ़ जाता है। 2021 में, इस इलाके के लिए विशेष तौर परबने ज़रूरी पुल और सड़क तबाह हो गए। आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) पर अनियोजितनिर्माण, नालियों को बंदकरना, इलाकों को पक्का करना और आधारभूत संरचनासुनियोजित नहीं होने की वजह से शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर परक्लाइमेट चेंज से जुड़ी अनिश्चितताओं काखतरा और बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में, सितंबर 2022 में हुई बारिश से बड़े टेक पार्क और महंगे हाउसिंग कॉम्प्लेक्स डूब गए, जिससे सड़कों और इमारतों की मरम्मत और बिजनेस को फिर से शुरू करने के लिए लगभग `225 करोड़ की ज़रूरत पड़ी। बेंगलुरु के आईटीसेक्टर में बड़ी रुकावटें आईं, जिससे उत्पादकताका नुकसान लाखों में हुआ।दिसंबर 2015 में चेन्नई में आई भयानक बाढ़, जिसमें 400 से ज़्यादा लोग मारे गए और हज़ारों करोड़ की संपत्तिका नुकसान हुआ, जिसनेशहरी जल विज्ञान (हाइड्रोलॉजी) और क्लाइमेट चेंज के असर को नज़रअंदाज़ करने के खतरों को उजागर किया मुंबई में बाढ़ का खतरा लगभग हर मॉनसून में सबके सामने आता है, जुलाई 2005 की बाढ़ तो यादों में बसी हुई है: एक ही दिन में 944 mm बारिश हुई, जिसमें 1,000 से ज़्यादा जानें गईं। 2023 में, सेंट्रल और ईस्ट दिल्ली के कुछ हिस्से पानी में डूब गए, जिससे पता चला कि राजधानी कीपुरानीऔर अक्सर जाम रहने वालीजल निकासी व्यवस्थाअनियमित बारिश से आसानी से प्रभावित होजातीहै। अक्टूबर 2020 में हैदराबाद में अचानक आई बाढ़ बादल फटने की वजह से आई, जिससे 24 घंटे में 190 mm से ज़्यादा बारिश हुई।70 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई, हज़ारों लोग बेघर हो गए, और संपत्तिके नुकसान का अंदाज़ा ₹8,000 करोड़ से ज़्यादा लगाया गया। 2020 में साइक्लोन अम्फान और 2021 में साइक्लोन यास के भयानक असर ने खराब मौसम की वजह से शहरी सिस्टम की कमजोरियोंको सामने ला दिया। जहाँ गुवाहाटी जैसे शहरबार-बार पानी भरने और भूस्खलन का दुष्प्रभावदेख रहे हैं; वहीं 2013 की केदारनाथ आपदा, 2014 में श्रीनगर में बाढ़, और 2019 में पटना में बहुत ज़्यादा भारी बारिश, जिससे बहुत ज़्यादा नुकसान हुआ, इस बात की स्पष्टयाद दिलाते हैं कि क्लाइमेट चेंज की तैयारी को प्राथमिकता देने की कितनी ज़रूरत है। ज़मीन और पानी को लेकर असुरक्षा की वजह से समुदायों के बीच झगड़े बढ़ रहे हैं, खासकर उन इलाकों में जहाँ पारंपरिक संसाधन साझाकरण प्रणाली ‘रिसोर्स-शेयरिंग सिस्टम’ पर्यावरण के दबाव में टूट रहे हैं। “क्लाइमेट-डिस्प्लेस्ड” आबादी, जिसमें ज़्यादातर गरीब लोग शामिल हैं, को अक्सर कानूनी सुरक्षा और सही मुआवज़े तक पहुँच की कमी होती है, जिससे मौजूदा असमानताएँ और बढ़ जाती हैं। साथ ही, संबंधितसरकारी संस्थाओं – हेल्थकेयर, फॉरेस्ट्री, सफ़ाई, आपदा से निपटने के लिए पुलिसिंग – इन सबपर बोझ बढ़ता जा रहा है, जिससे सरकार के लिए बराबरी से शिवादेना मुश्किल हो रहा है। जंगलों को एक तरह के ‘नेचुरल इंफ्रास्ट्रक्चर’ के तौर पर देखने की सोच तेज़ी से बढ़ रही है, यह ज़रूरी पारिस्थितिकी तंत्र सेवा (इकोसिस्टम सर्विस) देने में उनकी अहम भूमिका पर ज़ोर देती है, जो सीधे तौर पर इंसानों के द्वारा बनाई प्रणाली से जुड़ी पारंपरिक सेवाके जैसी ही हैं।‘इंजीनियर्ड इंफ्रास्ट्रक्चर’ की तरह ही, जंगल भी हाइड्रोलॉजिकल बुनियादी ढांचेको नियंत्रितकरते हैं, पानी को रोककर और धीरे-धीरे छोड़कर बाढ़ नियंत्रणमें अहम योगदान देते हैं; और बड़े पैमाने पर ‘कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन’ करते हुएवायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड के लिए ज़रूरी सिंक का काम करते हैं। यह नज़रिया ज़्यादा टिकाऊ योजना (सस्टेनेबल प्लानिंग) और विकासके तरीकों मेंबदलावला सकता है क्योंकि यहपारंपरिक इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट के साथ नेचुरल कैपिटल को जोड़ताहै। भारत के भविष्य को ‘क्लाइमेट-प्रूफ’ बनाने का कोई दूसरा पर्यायनहीं है। क्लाइमेट चेंज से बुनियादी ढांचेको बार-बार होने वाले नुकसान हमारे प्लानिंग कीकमियों को सामने लाते हैं, जिनमें से ज़्यादातर, जो दशकों पहले बने थे, आज के क्लाइमेट की चरम सीमा के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए थे। भारत को अपने योजना और विकासके तरीके में बड़े बदलाव की ज़रूरत है। इसे भविष्य के लिए डिज़ाइन करना होगा (अर्थात, ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा जो ज़्यादा तापमान, भारी बारिश और तेज़ तूफ़ान झेल सके); जंगलों, झीलों, वेटलैंड्स और ग्रीन स्पेस को ठीक करके उनकीसुरक्षा करनी होगी; क्लाइमेट रिस्क को ध्यान में रखते हुए भूमि उपयोग विनियम (लैंड-यूज़ रेगुलेशन) लागू करने होंगे; और क्लाइमेट-रेज़िलिएंट कार्यक्रमऔर उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणाली (एडवांस्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम) के लिए निधि उपलब्ध कराने को प्राथमिकता देनी होगी।साथ ही, योजनाएं तैयार करनेऔर आपदा की तैयारी में स्थानीयलोगों कोशामिल करना होगाऔर उनके खास ज्ञान को पहचानते हुए उन्हें मज़बूत बनाना होगा।आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सिर्फ़ पर्यावरणीय कार्रवाई (एनवायरनमेंटल एक्शन) की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि शहरी विकास, एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट्री, हेल्थ और डिज़ास्टर मैनेजमेंट विभागों द्वारा एक साथमिलकर नीतिबनाने की भी ज़रूरत है ताकि यह पक्का हो सके कि ‘क्लाइमेट रेजिलिएंस सोशल जस्टिस’ औरराष्ट्रीय एकतासाथ-साथ चले। क्लाइमेट चेंज अब कोई दूर का खतरा नहीं है; यह यहीं है, और हमारी ज़िंदगी के हर पहलू पर असर डाल रहा है। इससे निपटना सिर्फ़ पर्यावरणका मुद्दा नहीं है; यह भारत की आर्थिक स्थिरता, सामाजिक कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षाके लिए अत्यावश्यक है।
यही वक्तहै …… तुरंतकार्रवाई करने का।
(लेखक पूर्व प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स, उ. प्र. और महाराष्ट्र हैं। बताए गए विचार उनके अपने हैं)

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