एडवोकेट दीपाली पाण्डेय एवं वृंदा मनजीत
नर्मदा नदी के पावन तट पर स्थित ओंकारेश्वर एक ऐसा तीर्थ है, जहां आस्था केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि हर क्षण अनुभव की जा सकती है। यह स्थान भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण विशेष महत्व रखता है, किंतु इसकी आध्यात्मिकता केवल मंदिरो तक सीमित नहीं – यह तो सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त है।ओंकारेश्वर की सबसे अदभुत विशेषता है यहां स्थित द्वीप, जिसका आकार ‘ૐ’के समान प्रतीत होता है। ‘ૐ’– जो सृष्टि का आदि नाद है,ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है – वही यहां धरती पर आकार रुप में दिखाई देता है। मानो स्वयं प्रकृति ने इस स्थान को आध्यात्मिकता का प्रतीक बना दिया हो। नर्मदा की शांत और गंभीर धारा इस द्वीप को चारों ओर से आलिंगन करती हुई बहती है। जल की कल कल ध्वनि और मंदिरों की घ्टियों का समवेत स्वर एक ऐसा वातावरण निर्मित करता है, जिस में मन स्वतः ही ध्यान की अवस्था में पहुंच जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि परिक्रमा भी करते हैं। ओंकारेश्वर की परिक्रमा एक विशेष आध्यात्मिक अनुभवन मानी जाती है, जिस में व्यक्ति न केवल स्थान का, बल्कि अपने भीतर के भावों का भी परिभ्रमण करता है। संध्या के समय जब नर्मदा तट पर आरती होती है, तो वह द्रश्य अत्यंत मनोहारी होता है। दीपों की झिलमिलाती रोशनी जल पर प्रतिबिंबित होती है, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं नर्मदा उस प्रकाश को अपने आंचल में समेट रही हो। उस क्षण में समय जैसे ठहर जाता है और केवल भक्ति का भाव शेष रह जाता है। ओंकारेश्वर में साधु-संतों की उपस्थिति इसे और भी पवित्र बनाती है। यहां हर ओर भजन, मंत्रोच्चार और ध्यान की धारा प्रवाहित होती रहती है। यह स्थान हमें बाहरी दुनिया की चंचलता से दूर ले जाकर भीतर की शांति से जोड़ता है। नर्मदा यहां केवल नदी नहीं, बल्कि एक साक्षी है – भक्त और भगवान के बीच के उस अद्रश्य संबंध की, जो शब्दों से परे है।ओंकारेश्वर हमें यह अनुभव कराता है कि जब मन ‘ૐ’की ध्वनि में लीन हो जाता है, तब व्यक्ति स्वयं को उसी अनंत चेतना का हिस्सा अनुभव करने लगता है।