वृंदा मनजीत

विश्व जल दिवस का उद्देश्य

आप सबको पता ही होगा कि हर वर्ष 22 मार्च को पूरी दुनिया में विश्व जल दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य जल के महत्व के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ाना और जल संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 1993 से इस दिवस को मनाने की शुरुआत की गई थी, ताकि विश्व भर में बढ़ते जल संकट की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सके। जल प्रथ्वी पर जीवन का आधार है। मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पति और सभी सुक्ष्म और बड़े जीव-जंतु अपने अस्तित्व के लिए जल पर निर्भर हैं। पीने, भोजन उत्पादन, स्वच्छता, ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरण संतुलन – प्रत्येक क्षेत्र में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए जल को केवल एक संसाधन नहीं बल्कि जीवन की मूल आवश्यकता माना जाता है। 

जल का महत्वः जीवन और विकास का आधार

मानव शरीर का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना होता है। पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से ढका हुआ है, लेकिन इसमें से समुद्रों में इकट्ठा हुआ लगभग 97 प्रतिशत पानी खारा है और पृथ्वी पर स्थित केवल 2.5 प्रतिशत ही मीठा पानी है। इस मीठे पानी का भी बहुत छोटा हिस्सा ही मानव उपयोग के लिए उपलब्ध है। जल न केवल पीने के लिए आवश्यक है बल्कि कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण के लिए भी अनिवार्य है, यहां तक की भोजन बनाने के लिए भी पानी की आवश्यकता पड़ती है। पेड़-पौधों की वृद्धि, पशुपालन, खाद्य उत्पादन और जैव विविधता को बनाए रखने के लिए भी पानी की ही आवश्यकता पड़ती है। विशेष रुप से भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पानी का महत्व और भी बढ़ जाता है। देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है और कृषि उत्पादन मुख्य रुप से पानी की उपलब्धता पर निर्भर करता है।

वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य में जल संसाधनों की स्थिति

विश्व स्तर पर जल संसाधनों की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण, जलवायु परिवर्तन और जल के अत्यधिक उपयोग के कारण कई देशों में पानी की कमी बढ़ रही है। भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी हीहै। भारत में दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जबकि वैश्विक मीठे जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा ही भारत के पास है। इससे स्पष्ट है कि भारत में जल संसाधनों पर दबाव बहुत अधिक है। इसके अलावा, देश के कई हिस्सों में वर्षा का वितरण भी असमान है। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है जबकि कई क्षेत्रों में बहुत कम वर्षा होती है। यह असंतुलन भी जल प्रबंधन की चुनौती को बढ़ाता है।

भारत में बढ़ता जल संकटः आंकडे और वास्तविकता

भारत में जल संकट एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। नीति आयोग की एक रीपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 60 करोड़ लोग जल संकट से प्रभावित है। रीपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सुरक्षित पेयजल की कमी के कारण या गंदा जल पीने के कारण भारत में हर वर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। इसके अलावा अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध जल संसाधनों से अंदाज से दोगुनी हो सकती है। यदि समय रहते जल संरक्षण और जल प्रबंधन के प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। राजस्थान, महाराष्ट्र, बुंदेलखंड, विदर्भ और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में अक्सर सूखे की स्थिति देखने को मिलती है। इन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है और भूजल स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जल की कमी और किसानों की चुनौतियां

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट का सबसे बड़ा प्रभाव किसानों पर पड़ता है। देश के कई दूर-दराज इलाकों में खेतों तक पर्याप्त सिंचाई का पानी नहीं पहुंच पाता। इससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है और किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है। भारत में कुल कृषि भूमि का लगभग 50 से 55 प्रतिशत हिस्सा अभी भी वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। इसका अर्थ यह है कि यदि मानसून कमज़ोर पड़ जाए तो किसानों की स्थिति कठिन हो जाती है। कई क्षेत्रों में नहरों या सिंचाई परियोजनाओं की कमी के कारण खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाता। ऐसी स्थिति में किसानों को कम पानी वाली फसलें उगानी पड़ती है या कभी कभी खेती छोड़ने तक की नौबत आ जाती है।

सहभागी सिंचाई प्रबंधन (पार्टिसिपेटरी ईरीगेशन मेनेजमेन्ट) की भूमिका

यहां एक महत्वपूर्ण कार्य के विषय में बात करना चाहती हूँ। किसी भी गांव में ऐसी स्थिति बन रही हो कि दूरसुदूर के खेतों तक नहरों का पानी पहूंच न रहा हो वहां के लिए इस तरह कार्य करना अत्यंत लाभप्रद होता है। जिस गांव में इस कार्ययोजना को क्रियान्वित किया है उस विषय में एक सच्ची बात बताती हूँ। एक गांव में शादी का माहौल था। पड़ोस के गांव के कई लोग रंगबेरंगी कपड़े और गहने पहनकर इस शादी में आए थे। लेकिन वे सब गांव की हरियाली और खुशहाली देखकर अचंबित थे। उन्होंने पंचायत के लोगों को पूछा कि आपका गांव इतना हराभरा और सुंदर कैसे लग रहा है? गांववालों ने कहा उन्हें यहां पानी की कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि उन्होंने पार्टिसिपेटरी इरिगेशन मेनेजमेन्ट शुरु किया है। इसी बात को विस्तार से बताते हुए उन्होंने बताया कि गांव के कुछ लोगों को मिलाकर एक सहकारी समिति बनाई। इस समिति में कुछ ओपरेटर्स को नियुक्त किया। सिंचाई विभाग का संपर्क करके नहर से मिलने वाले पानी का नेटवर्क बनाकर दूरदराज के खेतों तक पहुंचाने की व्यवस्था की। 
कौनसा किसान कौनसे समय पर कौनसा पाक उगाएगा उसकी सूचि बनाकर तैयार करके नोटिस बोर्ड पर लगा दी। कौनसे पाक को कितना और कब पानी लगेगा उस पर रोज चर्चा होने लगी। निश्चित समय पर योग्य समय तक प्रत्येक किसान को पानी मिलने की व्यवस्था बनी और ओपरेटर्स उस समय पर उस किसान को पानी पहुंचे इसके लिए नेटवर्क के बीच में लगे बेरीकेट को हटाकर पानी डायवर्ट करने का कार्य बखुबी निभाते रहे। 
इस तरह सब की फसल समय पर उगी और युं लहलहाई कि सब देखते रह गए। 

चेक डैम और जल संरचनाएः भूजल संरक्षण का प्रभावी उपाय

देश के कई राज्यों में जल संरक्षण के लिए चेक डैम और अन्य जल संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है। चेक डैम छोटे बांध होते हैं जो वर्षा के पानी को रोककर जमीन में समाने का अवसर देते हैं। इससे भूजन स्तर में वृद्धि होती है और आसपास के क्षेत्रों में कुओं तथा ट्यूबवेल में पानी की उपलब्धता बढ़ती है। विशेष रुप से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में चेक डैम निर्माण से सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। इन संरचनाओं के माध्यम से वर्ष जल को संरक्षित किया जा सकता है और सूखे की स्थिति में भी जल उपलब्धता बनाए रखी जा सकती है।

वर्षा जल संचयनः शहरों में जल संरक्षण का प्रभावी समाधान

शहरी क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए रेनवोटर हार्वेस्टिंग अर्थात वर्षा जल संचयन एक प्रभावी उपाय है। इस प्रणाली में घरों और इमारतों की छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को पाइप के माध्यम से एकत्र करके अंडरग्राउन्ड टेंक या भूमिगत जल भंडारण में संग्रहित किया जाता है। यह पानी घरेलू उपयोग, बागवानी या भूजल पुनर्भरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कई शहरों में नई इमारतों में वर्षा जल संचयन प्रणाली को अनिवार्य भी किया गया है। एक अनुमान के अनुसार यदि किसी 100 वर्ष मीटर की छत पर 600 मिलीमीटर वर्षा होती है तो लगभग 60,000 लीटर पानी एकत्र किया जा सकता है। यह पानी भविष्य में उपयोग के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। 

जल संरक्षण में नागरिकों की भागीदारी

जल संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर नागरिक की भागीदारी भी आवश्यक है। यदि प्रत्येक व्यक्ति पानी के उपयोग में सावधानी बरते तो बड़ी मात्रा में जल बचाया जा सकता है।
कुछ सरल उपाय इस प्रकार हैः

  • वर्षा जल संचयन को अपनाना
  • नल को अनावश्यक रुप से खुला न छोड़ना
  • पानी के रिसाव को तुरंत ठीक करना
  • बगीचों में ड्रिप सिंचाई का उपयोग करना
  • घरेलू जल का पुनः उपयोग करना

सरकारी पहल और जल संरक्षण कार्यक्रम

भारत सरकार और राज्य सरकारें जल संरक्षण के लिए कई योजनाएं चला रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना और भविष्य के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करना है। जैसे आप सब को पता ही होगा जल शक्ति अभियान जैसी पहलें जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देती हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री कृषि संचय योजना के माध्यम से किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इन योजनाओं का उद्देश्य ‘हर खेत को पानी’ उपलब्ध कराना है और जल संसाधनों का टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करना है।

जल संरक्षण एक सामूहिक जिम्मेदारी

जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि जीवन का आधार है। बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों के असंतुलित उपयोग के कारण जल संकट भविष्य में और भी गंभीर हो सकता है। भारत जैसे विशाल देश में जल प्रबंधन के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, शहरों में पानी के दुरुपयोग को रोकना चेक डैम निर्माण और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों को व्यापक रुप से अपनाना जरूरी है। विश्व जल दिवल हमें यह संदेश देता है कि पानी की हर बूंद कीमती है। यदि हम आज से ही जल संरक्षण के लिए प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जल संसाधन सुनिश्चित किए जा सकते हैं। अतः हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम पानी का सदुपयोग करेंगे, उसे व्यर्थ नहीं बहाएंगे और जन संरक्षण के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे।