न गरीब का भेद न अमिर का। भेद सबको एक समान प्रेम पूर्वक अपने जल से स्नान कराती अपने जल को पीने को देती जीवनदायिनी नर्मदा जी आपको बारंबार नमस्कार है

एडवोकेट दपाली पाण्डेय और वृंदा मनजीत

नर्मदा नदी का स्थान भारतीय जनमानस में केवल एक नदी का नहीं, बल्कि एक जीवंत देवी का है। सदियों से नर्मदा आस्था, साधना और सास्कृतिक परंपराओं का केन्द्र रही है। इसके तट पर विकसित धार्मिक अनुष्ठान और लोकविश्वास आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नर्मदा से जुड़ी सबसे प्रमुख धार्मिक परंपरा नर्मदा परिक्रमा है। यह परिक्रमा अन्य तीर्थ यात्राओं से अलग मानी जाती है, क्योंकि इसमें श्रद्धालु नदी को कभी पार नहीं करते, बल्कि दोनों तटों से पैदल चलते हुए पूर्ण परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा के दौरान संयम, सादगी और नियमों का विशेष महत्व होता है। यह यात्रा आत्मअनुशासन और साधना का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माँ नर्मदा का गहरा संबंध भगवान शिव से हैं। कहा जाता है कि नर्मदा शिव की तपस्या से प्रकट हुई थीं। कहते हैं ‘नर्मदा का कंकर कंकर है शंकर’ अर्थात नर्मदा के प्रत्येक कंकर को शिवलिंग स्वरुप माना जाता है, जो इसकी पवित्रता को दर्शाता है यही कारण है कि नर्मदा तट पर शिव मंदिरों की विशेष संख्या देखने को मिलती है। नर्मदा नदी के किनारे अनेक प्रमुख तीर्थ स्थल स्थित है, जिनमें अमरकंटक, ऑंकारेश्वर, महेश्वर, मंडलेश्वर और चौसठ योगिनी मंदिर प्रमुख है। ये तीर्थ स्थल न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को भी संजोए हुए हैं। नर्मदा जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि यह जल लंबे समय तक खराब नहीं होता और इसके स्पर्श मात्र से शुद्धि होती है। यद्यपि ये विश्वास धार्मिक आस्था पर आधारित है, फिर भी नर्मदा जल के प्रति श्रद्धा आज भी जनजीवन में गहरराई से रची-बसी है।

कल-कल बहती तेरी धारा, जग का करती है उद्धार

रेवा तेरे तट पर आकर, मिलता मन को असीम प्यार।

अमरकंटक से निकलकर, खंभात की खाड़ीतक

तूने सींचा है भारत का हृदय, अपनी ममता की धार से