नर्मदा नदी जीवन संस्कृति और आस्था की अविरल धारा मोक्षदायिनी दिव्य नदी
एडवोकेट दीपाली पाण्डेय एवं वृंदा मनजीत
पुराणों के अनुसार नर्मदाजी शिवपुत्री तथा अमरकंटक से प्रकट हुई पापमोचिनी व मोक्षदायिनी दिव्य नदी है। शिव की तपस्या करते हुए उनके पसीने से उत्पन्न हुई है इसलिए वह शांकरी भी कहलाती है। स्कन्दपुराण का रेवाखण्ड, अवंतीखण्ड के अंतर्गत आने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण खण्ड है, जो मुख्य रुप से नर्मदा नदी की महिमा, तीर्थों, तटों और उनसे जुड़ी धार्मिक कथाओं का वर्णन करता है। नर्मदाजी के महात्म्य में उन्हें गंगा से भी अधिक पवित्र एवं फल देने वाली नदी बताया गया है।रेवाखण्ड में विशेष रूप से नदी के भीतर और किनारों पर स्थित शिवलिंगों का वर्णन है। अनेक राजाओं एवं ऋषिमुनियों की कथाएं इस खण्ड का हिस्सा है। नर्मदा स्नान या परिक्रमा के समय रेवाखण्ड का पाठ करना विशेष रूप से अत्यंत फलदायी माना गया है।शिवजी ने उन्हें नर्मदा नाम दिया (नर्म) आनंद, देने वाली नदी है। सात पवित्र नदियों में से एक है जो भारत में पवित्र मानी जाती है। पुराणों में कहा गया है कि नर्मदाजी के केवल दर्शन मात्र से पुण्य लाभ मिलता है, पाप धुल जाते हैं।नर्मदा नदी के किनारे विकसित नर्मदा घाटी को भारत की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक माना जाता है। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस क्षेत्र में मानव सभ्यता हजारों वर्ष पूर्व से विद्यमान रही है। नर्मदा घाटी ने आदिमानव से लेकर संगठित समाज तक के विकास को देखा है।
पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में नर्मदा नदी का विस्तृत वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण और वायु पुराण में नर्मदा की महिमा, उत्पत्ति और इसके तटों पर स्थित तीर्थों का उल्लेख है।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिंधु कावेरी जलेडस्मिन् सन्निधिं कुरु ।।
कथाओं के अनुसार यह ऐसी नदी है जो कन्या है और मैकल पर्वत की पुत्री है। जब यह विवाह योग्य हुई तो उनके पिता ने घोषणा की थी कि जो भी राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प लाएगा उसके साथ अपनी कन्या का विवाह करेंगे। राजकुमार सोनभद्र फूल लाए और राजा ने उनका विवाह तय कर दिया। विवाह से पूर्व नर्मदाजी को अपने होने वाले पति को देखने का मन हुआ। नर्मदा ने अपनी दासी एवं सखी जुहिला को अपने संदेश व उपहार देकर राजकुमार सोनभद्र के पास भेज दिया।जाने से पहले जुहिला ने नर्मदाजी से उनके वस्त्र व आभूषण मांग लिए ताकि वह उनकी तरह दिख सके। जब जुहिला सोनभद्र के पास पहुंची तो सोनभद्र उसी को नर्मदा समझ, मोहित हो गए। ऐसे में जुहिला के मन में भी खोट आ गया और वह भी सत्य न बता सकी। जब काफि समय बीत गया तो जुहिला नहीं आयी तो नर्मदाजी स्वयं सोनभद्र से मिलने चल पड़ी। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि सोनभद्र जुहिला के साथ प्रेम में मग्न थे। अपने प्रिय एवं अपनी प्यारी सखी का विश्वासघात देखकर नर्मदाजी अत्यंत क्रोधित व आहत हुई। उन्होंने उसी क्षण निर्णय लिया कि वह कभी विवाह नहीं करेगी व चिर कुमारी रहेगी। उसी समय उन्होंने अपनी दिशा भी बदल दी जो पश्चिम से पूर्व के स्थान पर पूर्व से पश्चिम कर ली।इतिहास के विभिन्न कालखंडों में नर्मदा के तट पर कई महत्वपूर्ण नगर बसे। महेश्वर होल्कर काल में सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र रहा, जबकि मंडला गोंड राजाओं की राजधानी था। जबलपुर जैसे नगर व्यापार और प्रशासन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुए। इन नगरौं की स्थापत्य कला आज भी नर्मदा घाटी के समृद्ध इतिहास की गवाही देती है।नर्मदा नदी का आदिवासी संस्कृति से गहरा संबंध है। भील, गोंड और बैगा जैसे जनजातीय समुदाय सदियों से नर्मदा के किनारे रहते आए हैं। इनके लोकगीतों, पर्वो और जीवनशैली में नर्मदा को माँ का दर्जा प्राप्त है। नर्मदा इनके लिए केवल नदी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और जीवन का आधार है।
इस तरह पापनाशिनी, सुख आनंद देने वाली नर्मदा जी का पुराणों में भी अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन है।
"त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे"
का अर्थ है "हे देवी नर्मदा, मैं आपके चरण-कमलों में नमन करता/करती हूँ"। नर्मदे हर
आगामी लेखों में हम नर्मदा नदी के इन पहलुओं को और गहराई से समझने का प्रयास करेंगे।

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